तुम जो नहीं… तो सुबह भी रात की रुसवाई सी लगती है…! यूं तो लोग अपने बहुत हैं…, पर तुम बिन सब दुनिया पराई सी लगती है…! नदी का पर्वत से जुदा होकर सागर में मिलना…, भी अब तो बेवफाई सी लगती है…! तुम जो नहीं… तो सुबह भी रात की रुसवाई सी लगती है…! [...]
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तुम जो नहीं…
Posted in Memoirs, Poems, tagged hindi, Poem on May 5, 2010 | 44 Comments »